बुधवार 9 सितंबर 2026 - 08:37
इंसान और अल्लाह के बीच सबसे बड़ा पर्दा

इंसान की आत्मिक संरचना ऐसी है कि यदि वह अल्लाह के दरबार में गिड़गिड़ाता और विनम्रता प्रकट नहीं करता, तो उसमें अहंकार और सरकशी जैसी आत्मिक बुराइयां पैदा हो जाती हैं। गिड़गिड़ाना वास्तव में इंसान के अपने व्यक्तित्व के अहंकार को छोड़ देने से पैदा होता है और यही अवस्था अल्लाह के सामने उसकी वास्तविक स्थिति को अधिक स्पष्ट करती है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, “बर दरगाह-ए दोस्त” नामक पुस्तक के आधार पर आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी ने अपनी शिक्षाओं के एक भाग में गिड़गिड़ाने और विनम्रता को अहंकार को तोड़ने और अल्लाह के दरबार के निकट पहुंचने की कुंजी बताया है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि इंसान की आत्मिक संरचना पूर्ण बंदगी प्राप्त करने के लिए इस अवस्था की आवश्यकता रखती है।

इंसान की आत्मिक संरचना ऐसी है कि यदि वह अल्लाह के दरबार में गिड़गिड़ाता और विनती नहीं करता, तो वह विभिन्न आत्मिक बुराइयों में लिप्त हो जाता है। गिड़गिड़ाना इंसान को अहंकार और सरकशी से रोकता है और स्वयं इंसान के लिए अल्लाह तआला के सामने उसकी वास्तविक स्थिति को अधिक स्पष्ट करता है, क्योंकि यह अवस्था अपने अहंकार और झूठे आत्मसम्मान को छोड़ देने से पैदा होती है।

जब इंसान रोता और गिड़गिड़ाता है, तो वह अपने अहंकार को छोड़कर एक तरह से अपनी हार और असहायता को महसूस करता है। इसलिए अल्लाह की इबादत और उसके सामने अपनी बंदगी प्रकट करने के लिए यह सबसे उत्तम अवस्था है।

हदीस-ए-कुदसी में वर्णित है कि अल्लाह ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से फरमाया:

“ऐ ईसा! मुझे केवल गिड़गिड़ाने और विनम्रता की अवस्था में पुकारो।” (बिहार उल अनवार, भाग 14, पेज 290)

एक अन्य हदीस में फरमाया:

“ऐ ईसा! अपने दिल को विनम्र और झुका हुआ रखो।” (बिहार उल अनवार, भाग 14, पेज 298)

गिड़गिड़ाने और विनम्रता की यह अवस्था प्राप्त करना तथा इस अवस्था में रहने की सफलता भी अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है। ऐसा नहीं है कि जब हम चाहें, तभी रो सकें या गिड़गिड़ाने और विनम्रता की अवस्था प्राप्त कर सकें।

हालांकि, अल्लाह के सामने हमारी विनम्रता, अपनी कमजोरी का इज़हार, गिड़गिड़ाना और रोना अल्लाह के लिए किसी लाभ का कारण नहीं है। इंसान इतना कमजोर है कि अपने कर्मों के द्वारा अल्लाह पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता।

अल्लाह अपनी रचनात्मक शक्ति और अपनी कृपा के कारण हमें ऐसी अवस्थाएं प्रदान करता है। इनके परिणामस्वरूप हमारे ईमान, मार्गदर्शन और पहचान में वृद्धि होती है। वह हमें अपने गुनाहों को पहचानने और उनका स्वीकार करने की तौफीक देता है। हमारे और अल्लाह के बीच जो सबसे बड़ा पर्दा है, वह हमारा अहंकार, घमंड और आत्ममुग्धता है।

...अल्लाह की रहमत लगातार बरसते हुए झरने की तरह है। हम अपने गुनाहों को स्वीकार करके, गिड़गिड़ाकर, रोकर और अपने अहंकार को तोड़कर उस रहमत को प्राप्त कर सकते हैं। अन्यथा हमारे कर्म स्वयं रहमत पैदा नहीं कर सकते।

स्रोत: “बर दरगाह-ए दोस्त”, पेज 60 - 61

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha